Monday, 31 July 2017

भक्ति में शक्ति सिद्ध करतीं माँ कृष्णा बम





सावन के पावन महीने में देश-विदेश से आए लाखों शिवभक्त बिहार के सुल्तानगंज से कांवड़ में गंगाजल भरकर 105 किलोमीटर की पदयात्रा कर झारखंड के देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ का जलाभिषेक करने पहुंचते हैं, लेकिन 60 वर्षीय एक महिला पिछले 35 वर्षों से सावन में प्रत्येक रविवार को सुल्तानगंज से पदयात्रा कर सोमवार को शिव के दरबार में पहुंचती हैं। बिहार की मुजफ्फरपुर की रहने वाली कृष्णा रानी जो एक शिक्षिका हैं, अब मां कृष्णा बम बन गई हैं। उन्हें देखने और उनसे आर्शीवाद लेने के लिए रास्ते में हजारों लोग पंक्तिबद्ध खड़े रहते हैं। सावन के प्रत्येक सोमवार को कृष्णा डाक बम के रूप में देवघर पहुंचती हैं और बाबा बैद्यनाथ का जलाभिषेक करती हैं।

डाक बम उन्हें कहा जाता है जो गंगाजल भरकर लगातार चलते हुए 24 घंटे के अंदर बाबा दरबार पहुंचते हैं। यह संकल्प सुल्तानगंज में ही जल भरते समय लिया जाता है। डाक बम कृष्णा सावन के प्रत्येक रविवार को दोपहर ढ़ाई से तीन बजे के बीच सुल्तानगंज की उत्तरवाहिनी गंगा से जल उठाती हैं और देवघर तक का सफर 12 से 14 घंटे में पूरा कर बाबा के दरबार में पहुंच जाती हैं। इस दौरान पूरा रास्ता बोल बम और कृष्णा बम के नारे से गुंजायमान होता रहता है।



इस क्रम में बाबा के भक्त कृष्णा बम के दर्शन के लिए लालायित रहते हैं. सुल्तानगंज, तारापुर, रामपुर नहर, कटोरिया और सुइया पहाड़ क्षेत्र में कृष्णा बम को देखने के लिए भक्तों की लंबी कतार लगी रहती है. रास्ते में सुरक्षा के लिए पुलिस की व्यवस्था भी रहती है। कृष्णा बम लगातार 35 वर्षों से हर सावन में देवघर आ रही हैं। वैशाली के प्रतापगढ़ में जन्मी कृष्णा रानी इस समय मुजफ्फरपुर के एक विद्यालय में शिक्षिका हैं। विवाह के बाद उनके पति नंदकिशोर पांडेय कालाजार से पीडि़त हो गए थे। दिनोंदिन उनकी हालत खराब होती जा रही थी। तब उन्होंने संकल्प लिया कि पति के ठीक होने पर वह कांवड़ लेकर हर साल सावन में बाबा बैद्यनाथ का जलाभिषेक करेंगी। बाबा बैद्यनाथ ने उनकी प्रार्थना सुन ली। 


माँ कृष्णा बम साइकिल से 1900 किलोमीटर तक की वैष्णो देवी की यात्रा भी कर चुकी हैं। इसके अलावा हरिद्वार से बाबाधाम, गंगोत्री से रामेश्वरम और कामरूप कामख्या की भी यात्रा साइकिल से कर चुकी हैं। वह कहती हैं, अगर भगवान के प्रति समर्पण की भावना हो तो खुद भक्त में शक्ति आ जाती है। इसके लिए कुछ करने की आवश्यकता नहीं होती। मैं खुद को भगवान शिव के हवाले कर चुकी हूं और आज जो भी कर रही हूं, वह भगवान की कृपा से कर पा रही हूँ। उन्हें उनके पति और पूरे परिवार का सहयोग मिलता है।

Sunday, 30 July 2017

बाबा बासुकीनाथ धाम दर्शन



बाबा बैद्यनाथ धाम से 42 कि.मी. दूर स्थित बाबा बासुकीनाथ धाम शिवभक्तों के हृदय में एक विशेष स्थान रखता है। यह स्थान झारखंड राज्य के दुमका जिले में स्थित है। बाबा नगरी बैद्यनाथ धाम आए हुए शिवभक्त इस स्थान पर जाना कभी नही भूलते। ऐसी मान्यता है कि बाबा बैद्यनाथ के जलाभिषेक के उपरांत बाबा बासुकीनाथ को जलार्पण न करने से उनकी पूजा अधूरी रह जाती है। इसीलिए सुल्तानगंज के उत्तरवाहिनी गंगा घाट से काँवरियागण दो पात्रों में गंगा जल लेकर आते है। पहले पात्र के जल को बाबा बैद्यनाथ पर अर्पित किया जाता है तथा दूसरे पात्र के जल को बाबा बासुकीनाथ पर अर्पित किया जाता है। काँवरियागण बैद्यनाथ धाम से बासुकीनाथ धाम की दूरी पैदल अथवा वाहन के माध्यम से तय करते हैं। बाबा बासुकीनाथ के बारे में मान्यता है कि इनके दरबार मे फौजदारी मुकदमे की सुनवाई होती है तथा बाबा अपने भक्तों की मनोकामनाएं शीघ्र ही पूर्ण करते हैं।




बाबा बासुकीनाथ की पौराणिक कथा ◆

प्राचीन समय मे बासुकी नामक एक किसान भगवान शिव के अनन्य भक्त थे। उस समय इस स्थान पर विनाशकारी अकाल पड़ गया। बासुकी सहित गाँव के समस्त निवासी त्राहिमाम करने लगे। सूखे तथा अकाल के कारण लोग मरने लगे। इस विनाशकारी समय मे भी बासुकी हार नही माने तथा जल की तलाश में जमीन को खोदने लगे। जमीन खोदने के क्रम में उनका फावड़ा अंदर किसी वस्तु से जा टकराया। जब उन्होंने मिट्टी हटाई तो उन्होंने देखा कि एक शिवलिंग के ऊपर रक्त का स्त्राव हो रहा था तथा उनका फावड़ा रक्तरंजित हो चुका था। वे अत्यंत भयभीत हो गए। तब शिवजी प्रकट हुए, उन्होंने बासुकी के इक्षा-शक्ति की प्रशंसा करते हुए उन्हें कहा कि इस शिवलिंग को इसी स्थान पर स्थापित कर दो। आज से ये धाम तुम्हारे नाम से जाना जाएगा। उसी दिन से ये धाम बाबा बासुकीनाथ धाम से जाना जाता है। यहाँ स्थित शिवलिंग का रूप " नागेश " का है। बाबा बासुकीनाथ पर दूध से जलाभिषेक करने का एक विशेष महत्व है।

 बाबा बासुकीनाथ समस्त प्राणियों का कल्याण करें। ●


Thursday, 27 July 2017

देवघर काँवर यात्रा की महिमा



बाबा बैद्यनाथ की काँवर यात्रा आदि-अनादि काल से चली आ रही है। विश्व के कोने-कोने से बाबा बैद्यनाथ के भक्त प्रत्येक वर्ष की सावन माह में देवघर की काँवर यात्रा करते हैं। देवघर प्रायः वर्ष के प्रत्येक माह में शिवभक्तों से भरा रहता है किंतु,सावन माह में यहाँ शिवभक्तों का सैलाब उमड़ पड़ता है। देश-विदेश से आए शिवभक्त बाबा बैद्यनाथ को जल अर्पित करते हैं तथा बाबा का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।



बिहार राज्य के सुल्तानगंज स्थित उत्तरवाहिनी गंगा घाट से यह पावन यात्रा प्रारंभ होती है। यहाँ बाबा अजगैबीनाथ का मंदिर स्थित है, जिनके बारे में उल्लेखित है कि इन्हें बाबा बैद्यनाथ के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त था।
सर्वप्रथम शिवभक्त इस पवित्र गंगाजल में स्नान करते हैं तथा अपने समस्त पापों को धोने की कामना माँ गंगा से करते हैं। इसके पश्चात वे अपने दो पात्रों में गंगाजल भरते हैं तथा संकल्प लेते हैं कि वे इस जल को बाबा बैद्यनाथ तथा बाबा बासुकीनाथ को निश्चित रूप से अर्पित करेंगे। इसी के साथ शिवभक्त काँवर में अपने दोनों पात्रों को बाँधकर कांवरिया का रूप धारण कर लेते हैं तथा यहीं से शुरू होती है देवघर की पावन काँवर यात्रा...

सुल्तानगंज से देवघर की कुल 105 कि.मी. की दूरी कांवरिया पैदल ही कई प्रकार की कठिनाइयों को सहते हुए तय करते हैं। "डाक बम" अपनी यात्रा 24 घंटे के अंदर पूरी करने को संकल्पित रहते हैं। ये मार्ग में कही विश्राम नही करते है और न कभी रुकते हैं।इसी प्रकार "ताड़क(सामान्य) बम" अपनी यात्रा 4 से 5 दिनों में पूरी करते हैं। सबसे कठिन यात्रा "दांडी बम" की होती है, ये जमीन पर लेटकर प्रणाम करते हुए इतनी लंबी दूरी तय करते हैं। इन्हें अपनी यात्रा पूरी करने में महीनों लग जाते हैं।

इस मार्ग में आप लाखों कांवरियों(बच्चे, बूढ़े, निःशक्त, दिव्यांग शिवभक्त) को केसरिया वस्त्र धारण कर तथा "बोल बम" के नारे के साथ काँवर लेकर बढ़ते हुए देख सकते हैं। पूरा मार्ग शिवमय हो जाता है। स्कन्द पुराण में वर्णन है कि जो नर-नारी अपने कंधे पर काँवर रखकर "बम बम" का उच्चारण करते हुए देवघर की यात्रा करते हैं उन्हें अश्वमेघ यज्ञ का पुण्य प्राप्त होता है। शिव पुराण में उल्लेख है कि बाबा भोलेनाथ धूप,दीप, नैवेध से उतने प्रसन्न नही होते हैं जितना काँवर जल के अभिषेक से प्रसन्न होते हैं।
पुराणों में वर्णन है कि राज्याभिषेक के पश्चात भगवान श्री राम अपनी पत्नी सीता एवं तीनो भाइयों सहित देवघर आए थे। उन्होंने उत्तरवाहिनी गंगा जल से बाबा का अभिषेक किया था।

   ◆ बाबा बैद्यनाथ समस्त प्राणियों का कल्याण करें। ◆
                                ★ बोल बम ★



Monday, 24 July 2017

करुणा एवं दया के सागर बाबा बैद्यनाथ

 
बाबा बैद्यनाथ की स्थापना सती माता के हृदय भूमि पर हुई है, इसीलिए बाबा बैद्यनाथ सुहृदय एवं बड़े दयालु हैं। बारह ज्योतिर्लिंगों को अलग-अलग कार्य सिद्धि के लिए पूजा जाता है। उदाहरणस्वरूप, मोक्ष प्राप्ति के लिए काशी में विराजित विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग की पूजा की जाती है। उज्जैन स्थित महाकाल ज्योतिर्लिंग की पूजा मारन, मोहन उच्चाटन से मुक्ति के लिए की जाती है। सौराष्ट्र स्थित सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की पूजा शांति और शीतलता के लिए की जाती है। जबकि बाबा बैद्यनाथ की पूजा समस्त कामनाओं की पूर्ति के लिए की जाती है। यहां प्रत्येक वर्ष फाल्गुन पूर्णिमा को भगवान शिव तथा भगवान विष्णु का हरिहर मिलन होता है। 



शिव-पुराण में उल्लेखित है कि कलयुग में भगवान शिव की आराधना से मुक्ति प्राप्त हो सकती है। मोक्ष का एकमात्र यही सुगम मार्ग है। भगवान शिव की आराधना हर युग में होती रही है। स्वयं भगवान राम भी शिव जी के अनन्य भक्त थे। उन्होंने लंका पर चढ़ाई करने से पहले रामेश्वरम में भगवान शिव की पूजा-अर्चना की थी। 

शिव के अनेकों रूप और ज्योतिर्लिंगों में एक बाबा बैद्यनाथ भी हैं। कलयुग में बाबा बैद्यनाथ का सर्वाधिक लोकप्रिय रूप आशुतोष रूप है। आशुतोष का अर्थ है शीघ्र प्रसन्न होना। बाबा बैद्यनाथ "कामना लिंग" के नाम से भी विश्व-विख्यात हैं। इसीलिए जो भक्त सच्ची निष्ठा, सच्चे विश्वास तथा आस्था के साथ बाबा के दरबार आते है, बाबा उसकी समस्त कामनाएं पूर्ण करते हैं।

बाबा बैद्यनाथ के भक्त कुल 105 कि.मी की कठिन पदयात्रा कर देवघर आते हैं। बाबा के समक्ष अपनी मनोकामना व्यक्त कर " अगले वर्ष उन्हें पुनः अपने धाम बुलाने की " प्रार्थना करते हैं। 

वास्तव में, बाबा बैद्यनाथ करुणा एवं दया के सागर हैं।

Saturday, 22 July 2017

बाबा का अतिप्रिय सावन माह


श्रावण का पावन मास प्रारंभ है। इसी के साथ विश्वभर से शिवभक्‍त अपने-अपने कांवर के साथ बाबा बैद्यनाथ का अभिषेक करने निकल पड़े हैं। देश के विभिन्‍न हिस्‍सों में स्‍थापित प्रसिद्ध शिव मंदिरों में शिवभक्‍तों के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया है। सनातन धर्म में इस माह की महिमा का बखान विभिन्‍न पुराणों और धार्मिक ग्रंथों में मुक्‍तकंठ से की गई है। आइए हम भी जानते हैं कि आखिर भगवान शिव को श्रावण मास माह अत्‍यंत प्रिय क्यों है और आखिर क्‍यों शिवभक्‍त इस पूरे माह भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक करते हैं?




सरल उपायों से प्रसन्न होते हैं बाबा



  • वैसे तो भगवान भोले भंडारी मात्र भाव के ही भूखे हैं। अर्थात्, भक्‍तिभाव से इनकी उपासना या आराधना करने वाले भक्‍तों पर बाबा शीघ्र ही प्रसन्न होते हैं। परंतु, कुछ ऐसी समय भी हैं जो भगवान भोलेनाथ को अत्‍यंत ही प्रिय हैं और इस समय भगवान भोलेनाथ के स्‍मरण मात्र से ही प्राणियों का कल्‍याण संभव है। पुराणों में सोमवार, महाशिवरात्रि (फाल्गुन मास के कृष्‍णपक्ष की तृतीया तिथि), शिवरात्रि (प्रत्‍येक मास के कृष्‍णपक्ष की तृतीया तिथि) तथा श्रावण के पूरे माह में भगवान शिव का स्‍मरण, मनन, चिंतन, पूजन, तप, व्रत-उपवास, रुद्राभिषेक, कवच का पाठ आदि अत्‍यंत फलदायक माना गया है। देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ को सुल्तानगंज के उत्तरवाहिनी गंगा जल से जलार्पण करने का विधान है। पुराणों में उल्लेखित है कि काँवर यात्रा कर बाबा बैद्यनाथ का जलाभिषेक करने वाले भक्तों की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।





इसलिए प्रिय है सावन मास


सावन मास में शिव भक्ति का पुराणों में भी उल्लेख मिलता है। पौराणिक कथाओं में वर्णन आता है कि इसी मास में समुद्र मंथन किया गया था। समुद्र मथने के बाद जो विष निकला उसे भगवान शंकर ने कंठ में समाहित कर सृष्टि की रक्षा की लेकिन विषपान से महादेव का कंठ नीलवर्ण हो गया। इसीसे उनका नाम नीलकंठ महादेव पड़ा। विष के प्रभाव को कम करने के लिए सभी देवी-देवताओं ने उन्हें जल अर्पित किया। इसलिए श्रावण मास में शिवलिंग पर जल चढ़ाने का विशेष है। यही वजह है कि श्रावण मास में भोले को जल चढ़ाने से विशेष फल की प्राप्ति होती है। शिवपुराण में उल्लेख है कि भगवान शिव स्वयं ही जल हैं। इसलिए जल से उनकी अभिषेक के रुप में अराधना का उत्तमोत्तम फल है जिसमें कोई संशय नहीं है।

Tuesday, 18 July 2017

रावणेश्वर बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग की पौराणिक कथा


देवों की नगरी देवघर में भगवान शिव साक्षात बसते हैं।झारखंड राज्य के देवघर जिले में स्थापित बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंगके दर्शन हेतु विश्व के कोने-कोने से श्रद्धालुगण आते हैं।यहाँ समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती है।



आइये जानते हैं ज्योतिर्लिंग के स्थापना का रहस्य


रावणेश्वर "बैधनाथ ज्योतिर्लिंग" शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में सबसे प्रमुख है। पुराणों के अनुसार, रावण भगवान भोलेनाथ का परम भक्त था।वह भगवान भोलेनाथ को अपनी भक्ति की सीमा में बांधकर रखना चाहता था। इसके लिए रावण ने कई उपाय किए पर भगवान भोलेनाथ भला एक के होकर कैसे रह सकते थे इसलिए रावण का हर दांव खाली गया।
जब रावण हारकर अपने सिर को काटने लगा तो शिव प्रकट हुए और रावण के साथ लंका जाने के लिए तैयार हो गए। लेकिन शर्त रख दी कि मैं तुम्हारे साथ लिंग रूप में चलूंगा। यह लिंग तुम जहां रख दोगे मैं वहीं पर स्थापित हो जाउंगा। रावण को अपनी शक्ति का बड़ा अभिमान था उसने सोचा कि शिवलिंग कितना भारी होगा इसे उठाकर में सीधा लंका ले जाऊंगा, यही सोचकर इसने शिव जी की शर्त झट से स्वीकार कर ली।
भगवान विष्णु ने देखा कि रावण शिव जी को लेकर लंका जा रहा है तो उन्हें जगत की चिंता सताने लगी। भगवान विष्णु ग्वाले के रूप में रावण के सामने प्रकट हो गए। इसी समय रावण को लघु शंका लगी और उसने ग्वाला बने विष्णु से अनुरोध किया कि शिवलिंग को अपने हाथों में थाम कर रखे, जब तक कि वह लघु शंका करके आता है।
रावण के पेट में गंगा समा गयी थी इसलिए वह लंबे समय तक लघुशंका करता रहा। इसी बीच ग्वाला बने विष्णु ने शिवलिंग को भूमि पर रख दिया और शिवलिंग वहीं स्थापित हो गया। रावण जब लघुशंका करने के बाद लौटा तो भूमि पर रखे शिवलिंग को देखकर ग्वाले पर बहुत क्रोधित हुआ। लेकिन वह कर भी क्या सकता था।
रावण ने शिवलिंग को उखाड़ने का पूरा प्रयास किया लेकिन वह टस से मस नहीं हुआ। क्रोध में आकर रावण ने शिवलिंग को अपने अंगूठे से दबा दिया और वहाँ से चला गया।अंततः समस्त देवी-देवता प्रसन्न होकर भगवान शिव की जय-जयकार करने लगे। देव शिल्पी विश्वकर्मा ने स्वयं यहाँ मन्दिर का निर्माण किया है।

      ◆● बाबा बैद्यनाथ की महिमा अपरंपार है। ●◆

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