त्रिशूल को शिव के संहारक शक्तियों का प्रतीक माना जाता है वहीं बाबा बैद्यनाथ धाम में स्थापित पंचशूलों को सृष्टि की समस्त शक्तियों का प्रतीक माना गया है। बाबा बैद्यनाथ धाम एक शक्तिपीठ भी है। शिव तथा शक्ति(माँ पार्वती) के एक साथ विराजने से यह पुण्य भूमि रचना शक्ति का प्रवाह करती है तथा पंचशूल इसी रचना शक्ति का प्रतीक है। इन पंचशूलों को पंचमहाभूतों का प्रतीक भी माना गया है जिनमे पंचतत्व समाहित हैं।
● पौराणिक मान्यता ●
ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव शंकर ने अपने सबसे प्रिय शिष्य शुक्राचार्य को पंचवक्त्रं निर्माण की विधि बताई थी। लंकापति रावण ने शुक्राचार्य से यह विद्या सीखी तथा उसी के आधार पर उसने लंका के चारों द्वार पर पंचशूल लगवाया। यह पंचशूल मनुष्य को अजेय शक्ति प्रदान करती है। यही कारण था कि भगवान श्री राम के लिए भी लंका पर आक्रमण करना कठिन था। विभीषण के द्वारा इस रहस्य की जानकारी श्री राम को प्राप्त हुई तथा अगस्त मुनि ने पंचशूल ध्वस्त करने का विधान श्री राम जी को बताया था। रावण ने उसी पंचशूल को बाबा बैद्यनाथ मंदिर के शीर्ष पर लगवाया ताकि मन्दिर पर किसी का दुष्प्रभाव न पड़े तथा मंदिर को कोई क्षति न पहुंचा सके। इस पंचशूल के दर्शन मात्र से मानव शरीर मे मौजूद पांच विकार- काम, क्रोध, लोभ, मोह तथा ईर्ष्या का नाश हो जाता है।
मुख्य मंदिर में स्वर्ण कलश के ऊपर लगे पंचशूल सहित यहाँ के समस्त 22 मंदिरों पर लगे पंचशूलों को वर्ष में एक बार महाशिवरात्रि के दिन नीचे उतारा जाता है। इन पंचशूलों को उतारने का कार्यभार एक निश्चित व्यक्ति को दिया गया है।पंचशूलों को नीचे एक निश्चित स्थान पर रखकर विशेष पूजन कर पुनः उसी स्थान पर स्थापित कर दिया जाता है। इस दौरान पंचशूलों को स्पर्श करने के लिए शिवभक्तों का सैलाब उमड़ पड़ता है।
● बाबा बैद्यनाथ समस्त प्राणियों का कल्याण करें ●



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