Monday, 24 July 2017

करुणा एवं दया के सागर बाबा बैद्यनाथ

 
बाबा बैद्यनाथ की स्थापना सती माता के हृदय भूमि पर हुई है, इसीलिए बाबा बैद्यनाथ सुहृदय एवं बड़े दयालु हैं। बारह ज्योतिर्लिंगों को अलग-अलग कार्य सिद्धि के लिए पूजा जाता है। उदाहरणस्वरूप, मोक्ष प्राप्ति के लिए काशी में विराजित विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग की पूजा की जाती है। उज्जैन स्थित महाकाल ज्योतिर्लिंग की पूजा मारन, मोहन उच्चाटन से मुक्ति के लिए की जाती है। सौराष्ट्र स्थित सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की पूजा शांति और शीतलता के लिए की जाती है। जबकि बाबा बैद्यनाथ की पूजा समस्त कामनाओं की पूर्ति के लिए की जाती है। यहां प्रत्येक वर्ष फाल्गुन पूर्णिमा को भगवान शिव तथा भगवान विष्णु का हरिहर मिलन होता है। 



शिव-पुराण में उल्लेखित है कि कलयुग में भगवान शिव की आराधना से मुक्ति प्राप्त हो सकती है। मोक्ष का एकमात्र यही सुगम मार्ग है। भगवान शिव की आराधना हर युग में होती रही है। स्वयं भगवान राम भी शिव जी के अनन्य भक्त थे। उन्होंने लंका पर चढ़ाई करने से पहले रामेश्वरम में भगवान शिव की पूजा-अर्चना की थी। 

शिव के अनेकों रूप और ज्योतिर्लिंगों में एक बाबा बैद्यनाथ भी हैं। कलयुग में बाबा बैद्यनाथ का सर्वाधिक लोकप्रिय रूप आशुतोष रूप है। आशुतोष का अर्थ है शीघ्र प्रसन्न होना। बाबा बैद्यनाथ "कामना लिंग" के नाम से भी विश्व-विख्यात हैं। इसीलिए जो भक्त सच्ची निष्ठा, सच्चे विश्वास तथा आस्था के साथ बाबा के दरबार आते है, बाबा उसकी समस्त कामनाएं पूर्ण करते हैं।

बाबा बैद्यनाथ के भक्त कुल 105 कि.मी की कठिन पदयात्रा कर देवघर आते हैं। बाबा के समक्ष अपनी मनोकामना व्यक्त कर " अगले वर्ष उन्हें पुनः अपने धाम बुलाने की " प्रार्थना करते हैं। 

वास्तव में, बाबा बैद्यनाथ करुणा एवं दया के सागर हैं।







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